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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 41
ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः परे नात्मनि विद्यते। चिदानन्दैकरूपत्वाद्दीप्यते स्वयमेव हि।।
परमात्मा में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का कोई भेद नहीं होता, क्योंकि वह चैतन्य-आनन्द स्वरूप है और स्वयं ही स्वतः प्रकाशित रहता है।
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