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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 40
रूपवर्णादिकं सर्वं विहाय परमार्थवित्। परिपूर्णचिदानन्दस्वरूपेणावतिष्ठते।।
परमार्थ का ज्ञाता समस्त रूप और वर्ण आदि को त्यागकर, परिपूर्ण चैतन्य-आनन्द स्वरूप में स्थित रहता है।
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