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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 39
आत्मन्येवाखिलं दृश्यं प्रविलाप्य धिया सुधीः। भावयेदेकमात्मानं निर्मलाकाशवत्सदा।।
बुद्धिमान साधक को चाहिए कि वह समस्त दृश्य जगत को आत्मा में ही लीन करके, एकाग्र चित्त से निर्मल आकाश के समान सदा एकमात्र आत्मा का ही ध्यान करे।
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