एवं निरन्तरकृता ब्रह्मैवास्मीति वासना।
हरत्यविद्याविक्षेपान्रोगानिव रसायनम्।।
इस प्रकार निरंतर अभ्यास द्वारा निर्मित "मैं ब्रह्म हूँ" की छाप अज्ञानता और उसके कारण होने वाली उत्तेजना को नष्ट कर देती है, जैसे दवा या रसायन रोग को नष्ट कर देता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
आत्मबोध के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।