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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 35
अहमाकाशवत्सर्वं बहिरन्तर्गतोऽच्युतः। सदा सर्वसमः सिद्धो निःसङ्गो निर्मलोऽचलः।।
मैं आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हूँ—अन्दर और बाहर सभी में स्थित, अच्युत (अविनाशी) स्वरूप। मैं सदा सर्वसम (सबमें समान), सिद्ध, निःसंग, निर्मल और अचल हूँ।
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