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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 27
रज्जुसर्पवदात्मानं जीवं ज्ञात्वा भयं वहेत्। नाहं जीवः परात्मेति ज्ञातश्चेन्निर्भयो भवेत्।।
जिस प्रकार रस्सी को सर्प मानने वाला व्यक्ति भय से ग्रसित हो जाता है, उसी प्रकार स्वयं को अहंकार (जीव) मानने वाला भी भय से वश में हो जाता है। हमारे भीतर अहं-केन्द्रित व्यक्तित्व यह जानकर निर्भयता को पुनः प्राप्त करता है कि यह एक जीव नहीं है बल्कि स्वयं परमात्मा है।
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