आत्मा कभी कुछ नहीं करता और बुद्धि की अपनी मर्जी से 'मैं जानता हूँ' अनुभव करने की क्षमता नहीं है। लेकिन हमारे भीतर का व्यक्तित्व भ्रांति से सोचता है कि वह स्वयं द्रष्टा और ज्ञाता है।
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