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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 25
आत्मनः सच्चिदंशश्च बुद्धेर्वृत्तिरिति द्वयम्। संयोज्य चाविवेकेन जानामीति प्रवर्तते।।
दोनों के अंधाधुंध सम्मिश्रण से - स्वयं के अस्तित्व-ज्ञान-पहलू और बुद्धि की विचार-तरंग - "मैं जानता हूँ" की धारणा उत्पन्न होती है।
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