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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 22
अज्ञानान्मानसोपाधेः कर्तृत्वादीनि चात्मनि। कल्प्यन्तेऽम्बुगते चन्द्रे चलनादि यथाम्भसः।।
अज्ञान के कारण मन रूपी उपाधि से युक्त आत्मा में कर्तृत्व आदि धर्मों की कल्पना की जाती है, जैसे जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा में जल की चंचलता का आरोप कर दिया जाता है।
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