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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 21
देहेन्द्रियगुणान्कर्माण्यमले सच्चिदात्मनि। अध्यस्यन्त्यविवेकेन गगने नीलतादिवत्।।
अविवेक के कारण निर्मल सत्-चित्-आनन्द स्वरूप आत्मा पर देह, इन्द्रिय, गुण और कर्मों का आरोप किया जाता है, जैसे आकाश में नीलिमा आदि का भ्रम आरोपित हो जाता है।
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