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आत्मबोध • अध्याय 1 • श्लोक 15
पञ्चकोशादियोगेन तत्तन्मय इव स्थितः। शुद्धात्मा नीलवस्त्रादियोगेन स्फटिको यथा।।
पाँच कोशों आदि के योग से आत्मा उन-उन रूपों में युक्त प्रतीत होता है, जबकि वास्तव में शुद्ध आत्मा उनसे असंग रहता है। जैसे नीले वस्त्र आदि के संयोग से स्फटिक नीला प्रतीत होता है, वैसे ही आत्मा भी उपाधियों के कारण विभिन्न रूपों में भासित होता है।
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