केवल विभिन्न उपाधियों के कारण ही जाति, नाम, आश्रम आदि के भेद आत्मा पर आरोपित किए जाते हैं, जैसे जल में रस, वर्ण आदि के भेद आरोपित प्रतीत होते हैं।
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