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अध्याय 30 — अध्याय 30

यजुर्वेद
22 श्लोक • केवल अनुवाद
हे (देव) दिव्यस्वरूप (सवितः) समस्त ऐश्वर्य से युक्त और जगत् को उत्पन्न करने हारे जगदीश्वर ! जो आप (दिव्यः) शुद्ध स्वरूप में हुआ (गन्धर्वः) पृथिवी को धारण करनेहारा (केतपूः) विज्ञान को पवित्र करनेवाला राजा (नः) हमारी (केतम्) बुद्धि को (पुनातु) पवित्र करे और जो (वाचः) वाणी का (पतिः) रक्षक (नः) हमारी (वाचम्) वाणी को (स्वदतु) मीठी चिकनी कोमल प्रिय करे, उस (यज्ञपतिम्) राज्य के रक्षक राजा को (भगाय) ऐश्वर्ययुक्त धन के लिए (प्र, सुव) उत्पन्न कीजिए और (यज्ञम्) राजधर्मरूप यज्ञ को भी (प्र, सुव) सिद्ध कीजिए ।
हे मनुष्यो ! (यः) जो (नः) हमारी (धियः) बुद्धि वा कर्मों को (प्रचोदयात्) प्रेरणा करे, उस (सवितुः) समग्र जगत् के उत्पादक सब ऐश्वर्य तथा (देवस्य) सुख के देनेहारे ईश्वर के जो (वरेण्यम्) ग्रहण करने योग्य अत्युत्तम (भर्गः) जिस से दुःखों का नाश हो, उस शुद्ध स्वरूप को जैसे हम लोग (धीमहि) धारण करें, वैसे (तत्) उस ईश्वर के शुद्ध स्वरूप को तुम लोग भी धारण करो ।
हे (देव) उत्तमगुणकर्मस्वभावयुक्त (सवितः) उत्तम गुण-कर्म-स्वभावों में प्रेरणा देनेवाले परमेश्वर ! आप हमारे (विश्वानि) सब (दुरितानि) दुष्ट आचरण वा दुःखों को (परा, सुव) दूर कीजिए और (यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारी धर्मयुक्त आचरण वा सुख है, (तत्) उस को (नः) हमारे लिए (आ, सुव) अच्छे प्रकार उत्पन्न कीजिए ।
हे मनुष्यो ! जिस (वसोः) सुखों के निवास के हेतु (चित्रस्य) आश्चर्यस्वरूप (राधसः) धन का (विभक्तारम्) विभाग करने हारे (सवितारम्) सब के उत्पादक (नृचक्षसम्) सब मनुष्यों के अन्तर्यामि स्वरूप से सब कामों के देखनेहारे परमात्मा की हम लोग (हवामहे) प्रशंसा करें, उसकी तुम लोग भी प्रशंसा करो।
हे परमेश्वर वा राजन् ! आप इस जगत् में (ब्रह्मणे) वेद और ईश्वर के ज्ञान के प्रचार के अर्थ (ब्राह्मणम्) वेद ईश्वर के जाननेवाले को (क्षत्राय) राज्य की रक्षा के लिए (राजन्यम्) राजपूत को (मरुद्भ्यः) पशु आदि प्रजा के लिए (वैश्यम्) प्रजाओं में प्रसिद्ध जन को (तपसे) दुःख से उत्पन्न होनेवाले सेवन के अर्थ (शूद्रम्) प्रीति से सेवा करने तथा शुद्धि करनेहारे शूद्र को सब ओर से उत्पन्न कीजिए (तमसे) अन्धकार के लिए प्रवृत्त हुए (तस्करम्) चोर को (नारकाय) दुःख बन्धन में हुए कारागार के लिए (वीरहणम्) वीरों को मारनेहारे जन को (पाप्मने) पापाचरण के लिए प्रवृत्त हुए (क्लीबम्) नपुंसक को (आक्रयायै) प्राणियों की जिसमें भागाभूगी होती, उस हिंसा के अर्थ प्रवृत्त (अयोगूम्) लोहे के हथियार विशेष के साथ चलनेहारे जन को (कामाय) विषय सेवन के लिए प्रवृत्त हुई (पुंश्चलूम्) पुरुषों के साथ जिसका चित्त चलायमान उस व्यभिचारिणी स्त्री को और (अतिक्रुष्टाय) अत्यन्त निन्दा करने के लिए प्रवृत्त हुए (मागधम्) भाट को दूर पहुँचाइये ।
हे जगदीश्वर ! वा राजन् ! आप (नृत्ताय) नाचने के लिए (सूतम्) क्षत्रिय से ब्राह्मणी में उत्पन्न हुए सूत को (गीताय) गाने के अर्थ (शैलूषम्) गाने हारे नट को (धर्माय) धर्म की रक्षा के लिए (सभाचरम्) सभा में विचरने हारे सभापति को (नर्माय) कोमलता के अर्थ (रेभम्) स्तुति करनेहारे को (आनन्दाय) आनन्द भोगने के अर्थ (स्त्रीषखम्) स्त्री से मित्रता रखनेवाले पति को (मेधायै) बुद्धि के लिए (रथकारम्) विमानादि को रचनेहारे कारीगर को (धैर्याय) धीरज के लिए (तक्षाणम्) महीन काम करनेवाले बढ़ई को उत्पन्न कीजिए (नरिष्ठायै) अति दुष्ट नरों की गोष्ठी के लिए प्रवृत्त हुए (भीमलम्) भयंकर विषयों को ग्रहण करनेवाले को (हसाय) हंसने के अर्थ प्रवृत्त हुए (कारिम्) उपहासकर्त्ता को और (प्रमदे) प्रमाद के लिए प्रवृत्त हुए (कुमारीपुत्रम्) विवाह से पहिले व्यभिचार से उत्पन्न हुए को दूर कर दीजिए ।
हे जगदीश्वर वा राजन् ! आप (तपसे) वर्त्तन पकाने के ताप को झेलने के अर्थ (कौलालम्) कुम्हार के पुत्र को (मायायै) बुद्धि बढ़ाने के लिए (कर्मारम्) उत्तम शोभित काम करनेहारे को (रूपाय) सुन्दर स्वरूप बनाने के लिए (मणिकारम्) मणि बनानेवाले को (शुभे) शुभ आचरण के अर्थ (वपम्) जैसे किसान खेत को वैसे विद्यादि शुभ गुणों के बोनेवाले को (शरव्यायै) बाणों के बनाने के लिए (इषुकारम्) बाणकर्त्ता को (हेत्यै) वज्र आदि हथियार बनाने के अर्थ (धनुष्कारम्) धनुष् आदि के कर्त्ता को (कर्मणे) क्रियासिद्धि के लिए (ज्याकारम्) प्रत्यञ्चा के कर्त्ता को (दिष्टाय) और जिस से अतिरचना हो उस के लिए (रज्जुसर्जम्) रज्जु बनानेवाले को उत्पन्न कीजिए और (मृत्यवे) मृत्यु करने को प्रवृत्त हुए (मृगयुम्) व्याध को तथा (अन्तकाय) अन्त करनेवाले के हितकारी (श्वनिनम्) बहुत कुत्ते पालनेवाले को अलग बसाइये।
हे जगदीश्वर वा राजन् ! आप (नदीभ्यः) नदियों को बिगाड़ने के लिए प्रवृत्त हुए (पौञ्जिष्ठम्) धानुक को (ऋक्षीकाभ्यः) गमन करनेवाली स्त्रियों के अर्थ प्रवृत्त हुए (नैषादम्) निषाद के पुत्र को (पुरुषव्याघ्राय) व्याघ्र के तुल्य हिंसक पुरुष के हितकारी (दुर्मदम्) दुष्ट अभिमानी को (गन्धर्वाप्सरोभ्यः) गाने-नाचनेवाली स्त्रियों के लिए प्रवृत्त हुए (व्रात्यम्) संस्काररहित मनुष्य को (प्रयुग्भ्यः) प्रयोग करनेवालों के अर्थ प्रवृत्त हुए (उन्मत्तम्) उन्माद रोगवाले को (सर्पदेवजनेभ्यः) साँप तथा मूर्खों के लिए हितकारी (अप्रतिपदम्) संशयात्मा को (अयेभ्यः) जो पदार्थ प्राप्त किये जाते उन के लिए प्रवृत्त (कितवम्) ज्वारी को (ईर्य्यतायै) कम्पन के लिए प्रवृत्त हुए (अकितवम्) जुआ न करनेहारे को (पिशाचेभ्यः) दुष्टाचार करने से जिन की आशा नष्ट हो गई वा रुधिरसहित कच्चा मांस खाने के लिए प्रवृत्त (विदलकारीम्) पृथक्-पृथक् टुकड़ों को करनेहारी को और (यातुधानेभ्यः) मार्गों से जिनके धन आता उस के लिए प्रवृत्त हुई (कण्टकीकारीम्) काँटें बोनेवाली को पृथक् कीजिए ।
हे जगदीश्वर वा सभापति राजन् ! आप (सन्धये) परस्त्रीगमन के लिए प्रवृत्त (जारम्) व्यभिचारी को (गेहाय) गृहपत्नी के सङ्ग के लिए प्रवृत्त हुए (उपपतिम्) पति की विद्यमानता में दूसरे व्यभिचारी पति को (आर्त्यै) कामपीड़ा के लिए प्रवृत्त हुए (परिवित्तम्) छोटे भाई का विवाह होने में बिना विवाहे ज्येष्ठ भाई को (निर्ऋत्यै) पृथिवी के लिए प्रवृत्त हुए (परिविविदानम्) ज्येष्ठ भाई के दाय को न प्राप्त होने में दाय को प्राप्त हुए हुए छोटे भाई को (अराध्यै) अविद्यमान पदार्थ को सिद्ध करने के लिए प्रवृत्त हुए (एदिधिषुःपतिम्) ज्येष्ठ पुत्री के विवाह के पहिले विवाहित हुई छोटी पुत्री के पति को (निष्कृत्यै) प्रायश्चित के लिए प्रवृत्त हुई (पेशस्कारीम्) शृङ्गार विशेष से रूप करनेहारी व्यभिचारिणी को (सम्, ज्ञानाय) उत्तम कामदेव को जगाने के अर्थ प्रवृत्त हुई (स्मरकारीम्) कामदेव को चेतन करानेवाली दूती को (प्रकामोद्याय) उत्कृष्ट कामों से उद्यत हुए के लिए (उपसदम्) साथी को (वर्णाय) स्वीकार के लिए प्रवृत्त हुए (अनुरुधम्) पीछे से रोकनेवाले को (बलाय) बल बढ़ाने के अर्थ (उपदाम्) नजर भेंट वा घूँस को पृथक् कीजिए ।
हे परमेश्वर वा राजन् ! आप (उत्सादेभ्यः) नाश करने को प्रवृत्त हुए (कुब्जम्) कुबड़े को (प्रमुदे) प्रबल कामादि के आनन्द के लिए (वामनम्) छोटे मनुष्य को (द्वार्भ्यः) आच्छादन के अर्थ (स्रामम्) जिस के नेत्रों से निरन्तर जल निकले उस को (स्वप्नाय) सोने के लिए (अन्धम्) अन्धे को और (अधर्माय) धर्माचरण से रहित के लिए (बधिरम्) बहिरे को पृथक् कीजिए और (पवित्राय) रोग की निवृत्ति करने के अर्थ (भिषजम्) वैद्य को (प्रज्ञानाय) उत्तम ज्ञान बढ़ाने के अर्थ (नक्षत्रदर्शम्) नक्षत्रों को देखने वा इनसे उत्तम विषयों को दिखानेहारे गणितज्ञ ज्योतिषी को (आशिक्षायै) अच्छे प्रकार विद्या ग्रहण के लिए (प्रश्निनम्) प्रशंसित प्रश्नकर्त्ता को (उपशिक्षायै) उपवेदादि विद्या के ग्रहण के लिए (अभि, प्रश्निनम्) सब ओर से बहुत प्रश्न करनेवाले को और (मर्यादायै) न्याय-अन्याय की व्यवस्था के लिए (प्रश्नविवाकम्) प्रश्नों के विवेचन कर उत्तर देनेवाले को उत्पन्न कीजिए ।
हे ईश्वर वा राजन् ! आप (अर्मेभ्यः) प्राप्ति करानेवालों के लिए (हस्तिपम्) हाथियों के रक्षक को (जवाय) वेग के अर्थ (अश्वपम्) घोड़ों के रक्षक शिक्षक को (पुष्ट्यै) पुष्टि रखने के लिए (गोपालम्) गौओं के पालनेहारे को (वीर्य्याय) वीर्य्य बढ़ाने के अर्थ (अविपालम्) गडरिये को (तेजसे) तेजवृद्धि के लिए (अजपालम्) बकरे-बकरियों को (इरायै) अन्नादि के बढ़ाने के अर्थ (कीनाशम्) खेतिहर को (कीलालाय) अन्न के लिए (सुराकारम्) सोम औषधियों से रस को निकालनेवाले को और (भद्राय) कल्याण के अर्थ (गृहपम्) घरों के रक्षक को (श्रेयसे) धर्म, अर्थ और कामना की प्राप्ति के अर्थ (वित्तधम्) धन धारण करनेवालों को और (आध्यक्ष्याय) अध्यक्षों के स्वत्व के लिए (अनुक्षत्तारम्) अनुकूल सारथि को उत्पन्न कीजिए।
हे जगदीश्वर वा राजन् ! आप (भायै) दीप्ति के लिए (दार्वाहारम्) काष्ठों को पहुँचानेवाले को (प्रभायै) कान्ति शोभा के लिए (अग्न्येधम्) अग्नि और इन्धन को (ब्रध्नस्य) घोड़े के (विष्टपाय) मार्ग के अर्थ (अभिषेक्तारम्) राजतिलक करनेवाले को (वर्षिष्ठाय) अतिश्रेष्ठ (नाकाय) सब दुःखों से रहित सुखविशेष के लिए (परिवेष्टारम्) परोसनेवाले को (देवलोकाय) विद्वानों के दर्शन के लिए (पेशितारम्) विद्या के अवयवों को जाननेवाले को (मनुष्यलोकाय) मनुष्यपन के देखने को (प्रकरितारम्) विक्षेप करनेवाले को (सर्वेभ्यः) सब (लोकेभ्यः) लोकों के लिए (उपसेक्तारम्) उपसेचन करनेवाले को (मेधाय) सङ्गम के अर्थ (वासःपूल्पूलीम्) वस्त्रों को शुद्ध करनेवाली औषधि को और (प्रकामाय) उत्तम कामना की सिद्धि के लिए (रजयित्रीम्) उत्तम रङ्ग करनेवाली औषधि को उत्पन्न प्रकट कीजिए और (अवऋत्यै) विरुद्ध प्राप्ति जिस में हो उस (वधाय) मारने के लिए प्रवृत्त हुए (उपमन्थितारम्) ताड़नादि से पीड़ा देनेवाले दुष्ट को दूर कीजिए ।
हे परमात्मा वा राजन् ! आप (ऋतये) हिंसा करने के लिए प्रवृत्त हुए (स्तेनहृदयम्) चोर के तुल्य छली-कपटी को और (वैरहत्याय) वैर तथा हत्या जिस कर्म में हो उस के लिए प्रवृत्त हुए (पिशुनम्) निन्दक को पृथक् कीजिए। (विविक्त्यै) विवेक करने के लिए (क्षत्तारम्) ताड़ना से रक्षा करने हारे धर्मात्मा को (औपद्रष्ट्र्याय) उपद्रष्टा होने के लिए (अनुक्षत्तारम्) धर्मात्मा के अनुकूलवर्त्ती को (बलाय) बल के अर्थ (अनुचरम्) सेवक को (भूम्ने) सृष्टि की अधिकता के लिए (परिष्कन्दम्) सब ओर से वीर्य्य सींचनेवाले को (प्रियाय) प्रीति के अर्थ (प्रियवादिनम्) प्रियवादी को (अरिष्ट्यै) कुशलप्राप्ति के लिए (अश्वसादम्) घोड़ों के चलानेवाले को (स्वर्गाय) सुखविशेष के (लोकाय) देखने वा संचित करने के लिए (भागदुघम्) अंशों को पूर्ण करनेवाले को (वर्षिष्ठाय) अतिश्रेष्ठ (नाकाय) सब दुःखों से रहित आनन्द के लिए (परिवेष्टारम्) सब ओर से व्याप्त विद्यावाले विद्वान् को प्रकट कीजिए ।
हे जगदीश्वर वा सभापते राजन् ! आप (मन्यवे) आन्तर्य क्रोध के अर्थ प्रवृत्त हुए (अयस्तापम्) लोह वा सुवर्ण को तपानेवाले को (क्रोधाय) बाह्य क्रोध के लिए प्रवृत्त हुए (निसरम्) निश्चित चलनेवाले को (शोकाय) शोच के लिए प्रवृत्त हुए (अभिसर्त्तारम्) सन्मुख चलनेवाले को और (यमाय) दण्ड देने के लिए प्रवृत्त हुई (असूम्) क्रोध के इधर-उधर हाथ आदि फेंकनेवाली को दूर कीजिये और (योगाय) योगाभ्यास के लिए (योक्तारम्) योग करनेवाले को (क्षेमाय) रक्षा के लिए (विमोक्तारम्) दुःख से छुड़ानेवाले को (उत्कूलनिकूलेभ्यः) ऊपर-नीचे किनारों पर चढ़ाने-उतारने के लिए (त्रिष्ठिनम्) जल स्थल और आकाश में रहनेवाले विमानादि यानों से युक्त पुरुष को (वपुषे) शरीरहित के लिए (मानस्कृतम्) मन से किए विचारों में प्रवीण को (शीलाय) जितेन्द्रियता आदि उत्तम स्वभाववाले के लिए (आञ्जनीकारीम्) प्रसिद्ध क्रियाओं के करने हारे स्वभाववाली स्त्री को और (निर्ऋत्यै) भूमि के लिए (कोशकारीम्) कोश का संचय करनेवाली स्त्री को उत्पन्न वा प्रगट कीजिये ।
हे जगदीश्वर वा राजन् ! आप (यमाय) नियमकर्त्ता के लिए (यमसूम्) नियन्ताओं को उत्पन्न करनेवाली को (अथर्वभ्यः) अहिंसकों के लिए (अवतोकाम्) जिसकी सन्तान बाहर निकल गई हो, उस स्त्री को (संवत्सराय) प्रथम संवत्सर के अर्थ (पर्यायिणीम्) सब ओर से काल के क्रम को जाननेवाली को (परिवत्सराय) दूसरे वर्ष के निर्णय के लिए (अविजाताम्) ब्रह्मचारिणी कुमारी को (इदावत्सराय) तीसरे इदावत्सर में कार्य साधने के अर्थ (अतीत्वरीम्) अत्यन्त चलनेवाली को (इद्वत्सराय) पाँचवें इद्वत्सर के ज्ञान के अर्थ (अतिष्कद्वरीम्) अतिशय कर जाननेवाली को (वत्सराय) सामान्य संवत्सर के लिये (विजर्जराम्) वृद्धा स्त्री को (संवत्सराय) चौथे अनुवत्सर के लिए (पलिक्नीम्) श्वेत केशोंवाली को (ऋभुभ्यः) बुद्धिमानों के अर्थ (अजिनसन्धम्) नहीं जीतने योग्य पुरुषों से मेल रखनेवाले को (साध्येभ्यः) और साधने योग्य कार्यों के लिए (चर्मम्नम्) विज्ञान शास्त्र का अभ्यास करनेवाले पुरुष को उत्पन्न कीजिए ।
हे जगदीश्वर वा राजन् ! आप (सरोभ्यः) बड़े तालाबों के लिए (धैवरम्) धीवर के लड़के को (उपस्थावराभ्यः) समीपस्थ निकृष्ट क्रियाओं के अर्थ (दाशम्) जिसको दिया जावे उस सेवक को (वैशन्ताभ्यः) छोटे-छोटे जलाशयों के प्रबन्ध के लिए (बैन्दम्) निषाद के अपत्य को (नड्वलाभ्यः) नरसलवाली भूमि के लिए (शौष्कलम्) मच्छियों से जीवनेवाले को और (विषमेभ्यः) विकट देशों के लिए (मैनालम्) कामदेव को रोकनेवाले को (अवाराय) अपनी ओर आने के लिए (कैवर्त्तम्) जल में नौका को इस पार उस पार पहुँचानेवाले को (तीर्थेभ्यः) तरने के साधनों के लिए (आन्दम्) बाँधनेवाले को उत्पन्न कीजिए (पाराय) हरिण आदि की चेष्टा को समाप्त करने को प्रवृत्त हुए (मार्गारम्) व्याध के पुत्र को (स्वनेभ्यः) शब्दों के लिए (पर्णकम्) रक्षा करने में निन्दित भील को (गुहाभ्यः) गुहाओं के अर्थ (किरातम्) बहेलिये को (सानुभ्यः) शिखरों पर रहने के लिए प्रवृत्त हुए (जम्भकम्) नाश करनेवाले को और (पर्वतेभ्यः) पहाड़ों से (किम्पूरुषम्) खोटे जङ्गली मनुष्य को दूर कीजिए।
हे जगदीश्वर वा राजन् ! आप (बीभत्सायै) धमकाने के लिए प्रवृत्त हुए (पौल्कसम्) भंगी के पुत्र को (पश्चादोषाय) पीछे दोष को प्रवृत्त हुए (ग्लाविनम्) हर्ष को नष्ट करनेवाले को (अभूत्यै) दरिद्रता के अर्थ समर्थ (स्वपनम्) सोने को (व्यृद्ध्यै) संपत् के बिगाड़ने के अर्थ प्रवृत्त हुए (अपगल्भम्) प्रगल्भतारहित पुरुष को तथा (संशराय) सम्यक् मारने के लिए प्रवृत्त हुए (प्रच्छिदम्) अधिक छेदन करनेवाले को पृथक् कीजिए और (वर्णाय) सुन्दर रूप बनाने के लिए (हिरण्यकारम्) सुनार वा सूर्य्य को (तुलायै) तोलने के अर्थ (वाणिजम्) बणिये के पुत्र को (विश्वेभ्यः) सब (भूतेभ्यः) प्राणियों के लिए (सिध्मलम्) सुख सिद्ध करनेवाले जिस के सहायी हों, उस जन को (भूत्यै) ऐश्वर्य होने के अर्थ (जागरणम्) प्रबोध को और (आर्त्यै) पीड़ा की निवृत्ति के लिए (जनवादिनम्) मनुष्यों को प्रशंसा के योग्य वाद-विवाद करनेवाले उत्तम मनुष्य को उत्पन्न वा प्रकट कीजिए ।
हे जगदीश्वर वा राजन् ! आप (अक्षराजाय) पासों से खेलनेवालों के प्रधान के हितकारी (कितवम्) जुआ करनेवाले को (मृत्यवे) मारने के अर्थ (गोव्यच्छम्) गौओं में बुरी चेष्टा करनेवाले को (अन्तकाय) नाश के अर्थ (गोघातम्) गौओं के मारनेवाले को (क्षुधे) क्षुधा के लिए (यः) जो (गाम्) गौ को मारता उस (विकृन्तन्तम्) काटते हुए को जो (भिक्षमाणाः) भीख माँगता हुआ (उपतिष्ठति) उपस्थित होता है (दुष्कृताय) दुष्ट आचरण के लिए प्रवृत्त हुए उस (चरकाचार्य्यम्) भक्षण करनेवालों के गुरु को (पाप्मने) पापी के हितकारी (सैलगम्) दुष्ट के पुत्र को दूर कीजिए (कृताय) किये हुए के अर्थ (आदिनवदर्शम्) आदि में नवीनों को देखनेवाले को (त्रेतायै) तीन के होने के अर्थ (कल्पिनम्) प्रशंसित सामर्थ्यवाले को (द्वापराय) दो जिस के इधर सम्बन्धी हों, उस के अर्थ (अधिकल्पिनम्) अधिकतर सामर्थ्ययुक्त को और (आस्कन्दाय) अच्छे प्रकार सुखाने के अर्थ (सभास्थाणुम्) सभा में स्थिर होनेवाले को प्रकट वा उत्पन्न कीजिए।
हे परमेश्वर वा राजन् ! आप (प्रतिश्रुत्कायै) प्रतिज्ञा करनेवाली के अर्थ (अर्त्तनम्) प्राप्ति करानेवाले को (घोषाय) घोषणे के लिए (भषम्) सब ओर से बोलनेवाले को (अन्ताय) समीप वा मर्य्यादावाले के लिए (बहुवादिनम्) बहुत बोलनेवाले को (अनन्ताय) मर्यादा रहित के लिए (मूकम्) गूँगे को (महसे) बड़े के लिए (वीणावादम्) वीणा बजानेवाले को (अवरस्पराय) नीचे के शत्रुओं के अर्थ (शङ्खध्मम्) शङ्ख बजानेवाले को और (वनाय) वन के लिए (वनपम्) जङ्गल की रक्षा करनेवाले को उत्पन्न वा प्रकट कीजिए (शब्दाय) शब्द करने को प्रवृत्त हुए (आडम्बराघातम्) हल्ला-गुल्ला करनेवाले को (क्रोशाय) कोशने को प्रवृत्त हुए (तूणवध्मम्) बाजे विशेष को बजानेवाले को (अन्यतोऽरण्याय) अन्य अर्थात् ईश्वरीय सृष्टि से जहाँ वन हों, उस देश की हानि के लिए (दावपम्) वन को जलानेवाले को दूर कीजिये।
हे परमेश्वर वा राजन् ! आप (नर्माय) क्रीड़ा के लिए प्रवृत्त हुई (पुंश्चलूम्) व्यभिचारिणी स्त्री को (हसाय) हंसने को प्रवृत्त हुए (कारिम्) विक्षिप्त पागल को और (यादसे) जलजन्तुओं के मारने को प्रवृत्त हुई (शाबल्याम्) कबरे मनुष्य की कन्या को दूर कीजिए (ग्रामण्यम्) ग्रामाधीश (गणकम्) ज्योतिषी और (अभिक्रोशकम्) सब ओर से बुलानेवाले जन (तान्) इन सब को (महसे) सत्कार के अर्थ (वीणावादम्) वीणा बजाने (पाणिघ्नम्) हाथों से वादित्र बजाने और (तूणवध्मम्) तूणवनामक बाजे को बजानेवाले (तान्) उन सब को (नृत्ताय) नाचने के लिए और (आनन्दाय) आनन्द के अर्थ (तलवम्) ताली आदि बजानेवाले को उत्पन्न वा प्रसिद्ध कीजिए।
हे परमेश्वर वा राजन् ! आप (अग्नये) अग्नि के लिए (पीवानम्) मोटे पदार्थ को (पृथिव्यै) पृथिवी के लिए (पीठसर्पिणम्) बिना पगों के कढ़िरि के चलनेवाले साँप आदि को (अन्तरिक्षाय) आकाश और पृथिवी के बीच में खेलने को (वंशनर्त्तिनम्) बाँस से नाचनेवाले नट आदि को (सूर्याय) सूर्य के ताप प्रकाश मिलने के लिए (हर्यक्षम्) बाँदर की सी छोटी आँखोंवाले शीतप्राय देशी मनुष्यों को (चन्द्रमसे) चन्द्रमा के तुल्य आनन्द देने के लिए (किलासम्) थोड़े श्वेतवर्णवाले को और (अह्ने) दिन के लिए (शुक्लम्) शुद्ध (पिङ्गाक्षम्) पीली आँखोंवाले को उत्पन्न कीजिए (वायवे) वायु के स्पर्श के अर्थ (चाण्डालम्) भंगी को (दिवे) क्रीड़ा के अर्थ प्रवृत्त हुए (खलतिम्) गंजे को (नक्षत्रेभ्यः) राज्य विरोध के लिए प्रवृत्त हुओं के लिए (किर्मिरम्) कबरों को और (रात्र्यै) अन्धकार के लिए प्रवृत्त हुए (कृष्णम्) काले रंगवाले (पिङ्गाक्षम्) पीले नेत्रों से युक्त पुरुष को दूर कीजिए ।
हे राजा लोगो ! जैसे विद्वान् (अतिदीर्घम्) बहुत बड़े (च) और (अतिह्रस्वम्) बहुत छोटे (च) और (अतिस्थूलम्) बहुत मोटे (च) और (अतिकृशम्) बहुत पतले (च) और (अतिशुक्लम्) अतिश्वेत (च) और (अतिकृष्णम्) बहुत काले (च) और (अतिकुल्वम्) लोमरहित (च) और (अतिलोमशम्) बहुत लोमोंवाले की (च) भी (एतान्) इन (विरूपान्) अनेक प्रकार के रूपोंवाले (अष्टौ) आठों को (आ, लभते) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वैसे तुम लोग भी प्राप्त होओ। (अथ) इस के अनन्तर जो (अशूद्राः) शूद्रभिन्न (अब्राह्मणाः) तथा ब्राह्मणभिन्न (प्राजापत्याः) प्रजापति देवतावाले हैं (ते) वे भी प्राप्त हों। जो (मागधः) मनुष्यों में निन्दित, जो (पुंश्चली) व्यभिचारिणी (कितवः) जुआरी (क्लीबः) नपुंसक (अशूद्राः) जिनमें शूद्र और (अब्राह्मणाः) ब्राह्मण नहीं, उनको दूर वसाना चाहिए और जो (प्राजापत्याः) राजा वा ईश्वर के सम्बन्धी हैं, (ते) वे समीप में वसाने चाहियें ।
Krishjan
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