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अध्याय 7 — सप्तमः खण्डः

सुबाल
2 श्लोक • केवल अनुवाद
जो शरीर के अन्दर हृदय रूपी गुहा में निवास करता है, वह आत्मा अज, एक और नित्य है। उसका शरीर पृथिवी है, जो पृथिवी में संचरित होता है; पर पृथिवी जिसे नहीं जानती। जल जिसका शरीर है, जो जल में संचरित होता है; पर जल जिसे नहीं जानता। तेज जिसका शरीर है, जो तेज में संचरित होता है; पर तेज जिसे नहीं जानता। वायु जिसका शरीर है, वायु में जो संचरित होता है; पर वायु जिसे नहीं जानता। आकाश जिसका शरीर है, जो आकाश में संचरित होता है; पर आकाश जिसे नहीं जानता। मन जिसका शरीर है, जो मन में संश्चरित होता है. पर मन जिसे नहीं जानता। बुद्धि जिसका शरीर है, जो बुद्धि में संचरित होता है; पर बुद्धि जिसे नहीं जानती। अहंकार जिसका शरीर है, जो अहंकार में संचरित होता है: पर अहंकार जिसे नहीं जानता। चित्त जिसका शरीर है, जो चित्त में संचरित होता है, पर चित्त जिसे नहीं जानता। अव्यक्त जिसका शरीर है, जो अव्यक्त में संचरित होता है; पर अव्यक्त जिसे नहीं जानता। अक्षर जिसका शरीर है, जो अक्षर में संचरित होता है पर अक्षर जिसे नहीं जानता। मृत्यु जिसका शरीर है, जो मृत्यु में संचारित होता है; पर मृत्यु जिसे नहीं जानती, वे सर्वभूतों के अन्तरात्मा, विनष्ट पाप वाले, एक, दिव्य, देव, नारायण हैं।
यह विद्या (नारायण ने) अपान्तरतम नामक ब्राह्मण (अति प्राचीन काल के सिद्ध ब्राह्मण) को दी थी। अपान्तरतम ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने घोराङ्गिरस को, घोराङ्गिरस ने रैक्व को, रैक्क ने राम को और राम ने समस्त भूतों को प्रदान की। इस प्रकार यह निर्वाण का अनुशासन है, वेद का अनुशासन है और वेद की शिक्षा है।
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