Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 12 — द्वादशः खण्डः
सुबाल
1 श्लोक • केवल अनुवाद
नारायण के द्वारा अन्न का आगमन हुआ है। वह
अन्न)
महासंवर्तक
(प्रलय काल में)
ब्रह्म के लोक में पका है, इसके बाद वह आदित्य
(कालाग्नि)
में पका है और इसके पश्चात् वह क्रव्यादि
(कल्याण-आवसथ्याग्रि)
में पका है। पुनः
(प्राणियों के द्वारा खाये जाने पर)
जठराग्नि में पका है। इस गीले बासी
(अन्न)
को संन्यासी
(कभी न खाये, अपितु)
पवित्र, अयाचित
(बिना माँगे हुए)
, असंकल्पित
(किसी घर विशेष से संकल्पपूर्वक न लेना)
भिक्षा में प्राप्त अन्न को ही ग्रहण करे। इस तरह से संन्यासी को किसी से भी अन्न की याचना नहीं करनी चाहिए।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें