Krishjan
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अध्याय 10 — दशमः खण्डः
सुबाल
2 श्लोक • केवल अनुवाद
इसके बाद पुनः रैक्व मुनि ने घोराङ्गिरस से प्रश्न किया कि "हे भगवन्! किसमें सभी प्रतिष्ठित हैं?" तदनन्तर उन घोराङ्गिरस ने कहना प्रारम्भ किया कि "रसातल के लोकों में सभी कुछ रहता है।" यह रसातल का लोक किसमें स्थित है? तब उन्होंने कहा कि "यह 'भू लोक' में स्थित है।" यह भूलोक किसमें स्थित है?
उन्होंने कहा
— "यह भुवः लोक में प्रतिष्ठित है।" यह भुवः लोक किसमें ओत-प्रोत है? तब उन्होंने बताया कि "यह स्वर्गलोक में स्थित है"। यह स्वर्गलोक किसमें ओत-प्रोत है? उन्होंने उत्तर दिया कि "यह महर्लोक में प्रतिष्ठित है।" यह महर्लोक किसमें ओत-प्रोत है?"
(उत्तर)
"यह जनोलोक में प्रतिष्ठित है।" इस प्रकार उन ऋषि ने पुनः कहा— यह जनोलोक किसमें ओत-प्रोत है?
(उत्तर)
"यह तपोलोक में स्थित है", ऐसा उन्होंने कहा।
(प्रश्न)
यह तपोलोक किसमें ओत-प्रोत है?
उन्होंने कहा
— "यह सत्यलोक में स्थित है।" यह सत्य लोक किसमें ओत-प्रोत है? "यह प्रजापति लोक में प्रतिष्ठित है"— ऐसा उन्होंने कहा। यह प्रजापति लोक किसमें ओत-प्रोत है? "यह ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित है"— ऐसा उन्होंने बताया। यह ब्रह्मलोक किसमें ओत-प्रोत है?
(यह अन्य किसी में ओत-प्रोत नहीं है)
समस्त लोक आत्म स्वरूप परब्रह्म में माला के दानों की भाँति ओत-प्रोत हैं। इस प्रकार उन्होंने कहा।
जो पुरुष इन सभी लोकों की आत्मा में ही स्थित रहता है, वह आत्मस्वरूप ही हो जाता है। इस तरह यह निर्वाण
(मोक्ष)
विषय का अनुशासन है, यही वेद की शिक्षा है एवं यही वेद की आज्ञा है।
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