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अध्याय 1 — प्रथमोऽध्यायः

संन्यास
1 श्लोक • केवल अनुवाद
अब संन्यास उपनिषद् का वर्णन करते हैं। क्रमानुसार नश्वर जगत् का परित्याग कर देने वाला विरक्त ही संन्यासी होता है। (प्रश्न) संन्यास किसे कहते हैं? संन्यासी किस तरह का होता है ? (उत्तर) संन्यासी वह है, जो आत्मा के उत्थान हेतु माता-पिता, स्त्री-पुत्र, बान्धव आदि के द्वारा अनुमोदित पूर्व में कहीं क्रियाओं का परित्याग कर देता है; जो हमेशा की तरह ऋत्विजों को नमन वंदन करने के पश्चात् वैश्वानर यज्ञ सम्पन्न करता है। इस पुनीत अवसर पर यजमान अपना सभी कुछ दान कर दे तथा ऋत्विज्ञ सम्पूर्ण सामग्री को पात्रों समेत हवन कर दे। संन्यासी द्वारा आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्रि इन तीनों अग्रियों तथा सभ्य (वैदिक कालोन अग्रि) एवं आवसथ्य (स्मृतिकालीन अग्नि) को प्राण, अपान, व्यान, उदान एवं समान पाँचों वायुओं में आरोपित करना चाहिए। शिखा (चोटी) सहित सभी केशों का मुण्डन करा देना चाहिए। यज्ञोपवीत को त्याग दे एवं पुत्र को देखकर इस तरह कहे कि तुम यज्ञ रूप हो, सर्वस्वरूप हो। यदि पुत्र न हो, तो वह अपनी आत्मा को ही लक्ष्य करके उपदेश देकर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर गमन कर जाए। चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) से भिक्षा स्वीकार करनी चाहिए। हाथ रूपी पात्र में भिक्षा ग्रहण कर भोजन करना चाहिए। भोजन को औषधि के समान ग्रहण करना चाहिए अर्थात् मात्र प्राण रक्षा की दृष्टि से आहार लेना चाहिए और जो कुछ प्राप्त हो जाए, वही ग्रहण करना चाहिए, जिससे चर्बी की वृद्धि न हो। इस प्रकार क्षीणकाय होकर गाँव में एक रात्रि एवं नगर में पाँच रात्रि तक निवास करना चाहिए। चातुर्मास (वर्षा के मास) में एक ही गाँव अथवा नगर में रुक जाना चाहिए या फिर पक्ष (पखवारा) को ही मास समझकर दो महीने तक निवास करना चाहिए। फटे वस्त्र अथवा वल्कल वस्त्र ही धारण करना चाहिए, अन्य वस्त्रों को ग्रहण न करे। इस तरह क्लेश सहना ही तप-तितिक्षा है। जो इस क्रम से संन्यास धारण करता है, उसके लिए यज्ञोपवीत क्या है? शिखा क्या है? आचमन किस तरह का है? इन सभी का उत्तर इस प्रकार है आत्मा का ध्यान हो संन्यासी का यज्ञोपवीत है। विद्या ही उसकी शिखा (चोटी) है। सर्वत्र स्थित जल के लिए उदर (पेट) ही संन्यासी का पात्र है तथा जलाशय का तट ही उसका आश्रय स्थल है। इसी प्रकार का ब्रह्मवादी भी होता है। उसके लिए सूर्य के अस्ताचल की ओर गमन करने पर आचमन किस तरह का है? इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-उस (संन्यासी) के लिए रात्रि एवं दिन दोनों ही एक जैसे हैं। उसके लिए न रात्रि होती है, नः दिन होता है। जो (संन्यासी अथवा साधक) अपनी आत्मा के अनुसंधान में सतत लगा रहता है, विद्वज्जनों के अनुसार उसके लिए सदैव दिन ही है।
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