Krishjan
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अध्याय 5 — पञ्चम खण्ड
जाबाल
2 श्लोक • केवल अनुवाद
इसके बाद
अत्रि मुनि ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया
— मैं यह जानना चाहता हूँ कि जिसने यज्ञोपवीत धारण नहीं किया है, वह ब्राह्मण किस प्रकार हो सकता है?
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया
— उसका आत्मा ही उसका यज्ञोपवीत होता है। वह जल से
(तीन बार)
प्राशन और आचमन करे। यह संन्यासियों
(परिव्राजकों)
की विधि है।
वीर पथ में, अनशन की स्थिति में,
(गंगा आदि के)
जल में प्रवेश करने पर, अग्नि प्रवेश में और महाप्रस्थान में परिव्राजक संन्यासी के लिए यही धर्म निश्चित है कि वह भगवा वस्त्र धारण करके मुण्डित होकर, अपरिग्रही बनकर, पवित्र और द्रोहरहित होकर भिक्षावृत्ति
(लोकमंगल के लिए)
अपनाकर जीवित रहे। यदि कोई संन्यास के लिए आतुर है, तो उसे मन और वाणी से
(विषयों का)
परित्याग करना चाहिए
(विषयों से संन्यस्त होना चाहिए)
। यह ज्ञान का पन्थ वेद प्रतिपादित है। इसीलिए संन्यासी के लिए यह सर्वथा उपयुक्त है, क्योंकि संन्यासी ब्रह्मविद् होता है। इस प्रकार भगवान् याज्ञवल्क्य ने यह मत प्रकट किया।
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