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अध्याय 10 — विभूतियोग

भगवद गीता
42 श्लोक • केवल अनुवाद
आनन्दमयी भगवान ने कहा - हे महाबाहु अर्जुन! अब आगे मेरे सभी दिव्य उपदेशों को पुनः सुनो। चूंकि तुम मेरे प्रिय सखा हो इसलिए मैं तुम्हारे कल्याणार्थ तुम्हें इन्हें प्रकट करूँगा।
न तो स्वर्ग के देवता और न ही महान ऋषि मेरी उत्पत्ति या वैभव को जानते हैं क्योंकि मैं ही सभी देवताओं और महान ऋर्षियों की उत्पत्ति का उद्गम हूँ।
वे जो मुझे अजन्मा, अनादि और समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी के रूप में जानते हैं, मनुष्यों में केवल वही मोह रहित और समस्त बुराइयों से मुक्त हो जाते हैं।
जीवों में विविध प्रकार के गुण जैसे-बुद्धि, ज्ञान, विचारों की स्पष्टता, क्षमा, सत्यता, इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण, सुख और दुख -
जन्म-मृत्यु, भय, निडरता, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश केवल मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
सप्त महर्षिगण और उनसे पूर्व चार महर्षि और चौदह मनु सब मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं तथा संसार में निवास करने वाले सभी जीव उनसे उत्पन्न हुए हैं।
जो मेरी महिमा और दिव्य शक्तियों को वास्तविक रूप से जान लेता है वह अविचल भक्तियोग के माध्यम से मुझमें एकीकृत हो जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।
मैं समस्त सृष्टि का उद्गम हूँ। सभी वस्तुएँ मुझसे ही उत्पन्न होती हैं। जो बुद्धिमान यह जान लेता है वह पूर्ण दृढ़ विश्वास और प्रेमा भक्ति के साथ मेरी उपासना करता है।
मेरे भक्त अपने मन को मुझ में स्थिर कर अपना जीवन मुझे समर्पित करते हुए सदैव संतुष्ट रहते हैं। वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते हुए मेरे विषय में वार्तालाप करते हुए और मेरी महिमा का गान करते हुए अत्यंत आनन्द और संतोष की अनुभूति करते हैं।
जिनका मन सदैव मेरी प्रेममयी भक्ति में एकीकृत हो जाता है, मैं उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान करता हूँ जिससे वह मुझे पा सकते हैं।
उन पर करुणा करने के कारण मैं उनके हृदयों में वास करता हूँ और ज्ञान के प्रकाशमय दीपक द्वारा अंधकार जनित अज्ञान को नष्ट करता हूँ।
अर्जुन ने कहा - आप परम पुरुषोत्तम भगवान, परमधाम, परम शुद्ध, अविनाशी भगवान, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं।
नारद, असित, देवल और व्यास जैसे महान ऋषि सभी इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझे यही सब बता रहे हैं।
हे कृष्ण! मैं आपके द्वारा कहे गए सभी कथनों को पूर्णतया सत्य के रूप में स्वीकार करता हूँ। हे परम प्रभु! न तो देवता और न ही असुर आपके वास्तविक स्वरूप को समझ सकते हैं।
हे परम पुरुषोत्तम! आप सभी जीवों के उदगम् और स्वामी हैं, देवों के देव और ब्रह्माण्ड नायक हैं। वास्तव में केवल आप अकेले ही अपनी अचिंतनीय शक्ति से स्वयं को जानने वाले हो।
प्रभु कृपया विस्तारपूर्वक मुझे अपने दिव्य ऐश्वर्यों से अवगत कराएँ जिनके द्वारा आप समस्त संसार में व्याप्त होकर उनमें रहते हों।
हे योग के परम स्वामी! मैं आपको ज्यादा अच्छे से कैसे जान सकता हूँ और कैसे आपका मधुर चिन्तन कर सकता हूँ। हे परम पुरुषोत्तम भगवान! ध्यानावस्था के दौरान मैं किन-किन रूपों में आपका स्मरण कर सकता हूँ।
हे जनार्दन! कृपया मुझे पुनः अपनी दिव्य महिमा, वैभवों और अभिव्यक्तियों के संबंध में विस्तृत रूप से बताएँ, मैं आपकी अमृत वाणी को सुनकर कभी तृप्त नहीं हो सकता।
आनन्दमय भगवान ने कहा! अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य महिमा का संक्षिप्त वर्णन करूँगा। हे श्रेष्ठ कुरुवंशी! इस वर्णन का कहीं भी कोई अंत नहीं है।
विभूति योग मैं सभी जीवित प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मैं ही समस्त जीवों का आदि, मध्य तथा अन्त हूँ।
मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु हूँ, प्रकाशवान पदार्थों में सूर्य, मरूतों में मुझे मरीचि और नक्षत्रों में रात्रि का चन्द्रमा समझो।
मैं वेदों में सामवेद, देवताओं में स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ। इन्द्रियों के बीच में मन और जीवित प्राणियों के बीच चेतना हूँ।
रुद्रों में मुझे शंकर जानो, यक्षों में मैं कुबेर हूँ, वसुओं में मैं अग्नि हूँ और पर्वतों में मेरु हूँ।
हे अर्जुन! पुरोहितों में मुझे बृहस्पति जानो और सेना नायकों में मैं कार्तिकेय हूँ और सभी जलाशयों में समुद्र हूँ।
मैं महर्षियों में भृगु हूँ, ध्वनियों में दिव्य ओम हूँ। मुझे यज्ञों में जपने वाला पवित्र नाम समझो। अचल पदार्थों में मैं हिमालय हूँ।
वृक्षों में मैं बरगद का वृक्ष हूँ और देव ऋषियों में मैं नारद हूँ, गंधों में मैं चित्ररथ हूँ, सिद्ध पुरुषों में मैं कपिल मुनि हूँ।
अश्वों में मुझे उच्चैश्रवा समझो जो अमृत के लिए समुद्र मंथन के समय प्रकट हुआ था। हाथियों में मुझे गर्वित ऐरावत समझो और मनुष्यों में मैं राजा हूँ।
शस्त्रों में मैं वज्र हूँ और गायों में कामधेनु हूँ, सन्तति के समस्त कारणों में मैं प्रेम का देवता कामदेव और सर्पो में वासुकि हूँ।
विभूति योग अनेक फणों वाले सों में मैं अनन्त हूँ, जलचरों में वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ और नियमों के नियामकों में मैं मृत्यु का देवता यमराज हूँ।
दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ और दमनकर्ताओं में मैं काल हूँ। पशुओं में मुझे सिंह मानो और पक्षियों में मुझे गरूड़ जानो।
पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ और शस्त्र चलाने वालों में मैं भगवान श्रीराम हूँ, जलीय जीवों में मगर और बहती नदियों में गंगा हूँ।
हे अर्जुन! मुझे समस्त सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत जानो। सभी विद्याओं में मैं आध्यात्म विद्या हूँ और सभी तर्कों का मैं तार्किक निष्कर्ष हूँ।
अक्षरों में अकार और समासों में द्वन्द्व समास मैं हूँ। अक्षयकाल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुख वाला धाता भी मैं हूँ।
सब का हरण करने वाली मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उभ्दव मैं हूँ तथा स्त्री-जाति में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ।
गायी जाने वाली श्रुतियों में बृहत्साम और वैदिक छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ। बारह महीनों में मार्गशीर्ष और छः ऋतुओं में वसन्त मैं हूँ।
छल करने वालों में जूआ और तेजस्वियों में तेज मैं हूँ। जीतने वालों की विजय, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक मनुष्यों का सात्त्विक भाव मैं हूँ।
वृष्णिवंशियों में वासुदेव और पाण्डवों में धनञ्जय मैं हूँ। मुनियों में वेदव्यास और कवियों में कवि शुक्राचार्य भी मैं हूँ।
दमन करनेवालों में दण्डनीति और विजय चाहने वालों में नीति मैं हूँ। गोपनीय भावों में मौन और ज्ञानवानों में ज्ञान मैं हूँ।
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों का जो बीज है, वह बीज मैं ही हूँ; क्योंकि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है अर्थात् चर-अचर सब कुछ मैं ही हूँ।
हे परंतप अर्जुन! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है। मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियों का जो विस्तार कहा है, यह तो केवल संक्षेप से कहा है।
जो-जो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उस-उस को तुम मेरे ही तेज (योग) के अंश से उत्पन्न हुई समझो।
अथवा हे अर्जुन! तुम्हें इस प्रकार बहुत-सी बातें जानने की क्या आवश्यकता है? मैं अपने किसी एक अंश से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हूँ।
Krishjan
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