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अध्याय 1 — आत्मपूजोपनिषद

आत्मपूजा
20 श्लोक • केवल अनुवाद
उस आत्म तत्व का सतत चिन्तन ही उसका ध्यान है।
समस्त कर्मों का निराकरण ही आवाहन है।
अविचल ज्ञान ही उसका आसन है।
उस आत्म तत्व के प्रति सदा उन्मुख रहना ही पाद्य है।
उस ओर सदैव मनोयोग ही अर्ध्य है।
आत्मा की निरन्तर दीप्ति ही आचमन है।
श्रेष्ठता की प्राप्ति ही उसका स्नान है।
सर्वात्मक दृश्य का विलय (शुन्य-लयसमाधि) ही गन्ध है।
विशिष्ट नेत्र (अन्तर्नेत्र) ही अक्षत हैं।
चित् (चैतन्य) दीप्ति ही पुष्प है।
चित् रुपी अग्नि ही धूप है |
उस (आत्म तत्त्व) का सूर्यात्मकत्व ही दीपक है।
पूर्ण चन्द्र और उसके अमृत रूपी रस का एकीकरण ही नैवेद्य है।
उसकी सुनियोजित गतिशीलता ही प्रदक्षिणा है।
उसका सोऽहम् (मैं वही ब्रह्म हूँ) भाव ही नमन है।
मौन (अन्तर्मुखी) रहना ही उसकी स्तुति करना है।
सदैव सन्तुष्ट रहना, उसका विसर्जन है।
इस प्रकार परिपूर्ण राजयोगी का सर्वात्मक पूजा-उपचार ही उस आत्म तत्त्व का आधार है।
सर्वात्मकत्व ही उस आत्म तत्त्व का आधार है।
समस्त आधि-व्याधियों से रहित मैं पूर्ण ब्रह्म हूँ, ऐसा भाव रखने से ही मुमुक्षुओं (मोक्ष के अभिलाषियों) को मोक्ष प्राप्त करने की अभिलाषा सिद्ध होती है। यही उपनिषद् (तत्त्वज्ञान) है।
Krishjan
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