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ज़फ़रनामा Book Cover

ज़फ़रनामा

ज़फ़रनामा सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु गोविन्द सिंह द्वारा लिखा गया वह पत्र है, जो उन्होंने सन 1706 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब को लिखा था। 'ज़फ़रनामा' में गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगज़ेब के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी। इस पत्र को 'विजय पत्र' भी कहा जाता है। नि:संदेह गुरु गोविन्द सिंह का यह पत्र आध्यात्मिकता, कूटनीति तथा शौर्य की अद्भुत त्रिवेणी है।
ग्रंथकार: गोबिन्द सिंह
अध्याय: 1
शास्त्र परिचय
ज़फ़रनामा सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु गोविन्द सिंह द्वारा लिखा गया वह पत्र है, जो उन्होंने आनन्दपुर छोड़ने के बाद सन 1706 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब को लिखा था। इस पत्र को पढ़ कर औरंगज़ेब अत्यंत प्रभावित हुआ था। इस समय बादशाह औरंगज़ेब अपने जीवन के अंतिम दिन जी रहा था। यह पत्र मूल रूप से फ़ारसी भाषा में लिखा गया था। 'ज़फ़रनामा' में गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगज़ेब के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी। इस पत्र को 'विजय पत्र' भी कहा जाता है। नि:संदेह गुरु गोविन्द सिंह का यह पत्र आध्यात्मिकता, कूटनीति तथा शौर्य की अद्भुत त्रिवेणी है। 'ज़फ़रनामा' का शाब्दिक अर्थ होता है- "विजय का पत्र"। पत्र में औरंगज़ेब की झूठी कसमों एवं उसके कुशासन की चर्चा की गई है। 'ज़फ़रनामा' में मुग़लों के अत्याचार, उनके राजनीतिक दृष्टिकोण, मुल्ला-मौलवियों के तौर-तरीके आदि की भी चर्चा है। गुरु गोविन्द सिंह द्वारा औरंगज़ेब को फ़ारसी में लिखे पत्रों का एक दूसरा संग्रह 'हिकायतनामह' के नाम से है। 'ज़फ़रनामा' में स्वयं गुरु गोविन्द सिंह जी ने लिखा है कि- "जब सारे साधन निष्फल हो जायें, तब तलवार ग्रहण करना न्यायोचित है।" अपने माता-पिता, पुत्रों और हज़ारों सिक्खों के प्राणों की आहुति देने के बाद गुरु गोविन्द सिंह औरंगज़ेब को फ़ारसी भाषा में लिखे अपने पत्र 'ज़फ़रनामा' में लिखते हैं- "औरंगज़ेब तुझे प्रभु को पहचानना चाहिए तथा प्रजा को दु:खी नहीं करना चाहिए। तूने क़ुरान की कसम खाकर कहा था कि मैं सुलह रखूँगा, लड़ाई नहीं करूँगा, यह क़सम तुम्हारे सिर पर भार है। तू अब उसे पूरा कर।" 'ज़फ़रनामा' के लेखक का स्वर एक विजेता का स्वर है, जिसमें किसी प्रकार के विषाद एवं कुंठा की झलक दिखाई नहीं पड़ती। अत्यन्त ओजस्वी भाषा में गुरु गोविन्द सिंह औरंगज़ेब की तमाम अच्छाइयों को दिखाते हुए भी डटकर लिखते हैं कि- "तुम धर्म से कोसों दूर हो।"
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