वृत्रगीता
महाबली वृत्रासुर को जब देवताओं द्वारा पराजित होकर भी कोई शोक-सन्ताप नहीं हुआ तो दैत्यगुरु शुक्राचार्यजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके पूछने पर वृत्रासुर ने बहुत ज्ञानयुक्त वचन कहे, परंतु साथ ही वृत्रासुर ने भगवान् विष्णु के प्रभाव, मनुष्यों द्वारा जीवनधारण के हेतु, कर्मों में प्रवृत्ति का कारण, कर्मफल तथा सनातनपद की प्राप्ति का उपाय आदि के विषय में जिज्ञासा व्यक्त की, जिसका समाधान वहाँ उपस्थित हुए भगवान् सनत्कुमारजी ने उत्तम रीति से किया, जो सभी कल्याणकामी साधकों के लिये लाभप्रद है।
ग्रंथकार: व्यास
अध्याय: 2