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स्वसंवेद्य Book Cover

स्वसंवेद्य

'स्व'-आत्मतत्त्व का, संवेद्य-अनुभव प्राप्त करना, इस उपनिषद् का प्रयोजन है। इसमें एक ही मन्त्र चार प्रखण्डों में विभक्त है।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 1
शास्त्र परिचय
'स्व'-आत्मतत्त्व का, संवेद्य-अनुभव प्राप्त करना, इस उपनिषद् का प्रयोजन है। इसमें एक ही मन्त्र चार प्रखण्डों में विभक्त है। पहले प्रखण्ड में प्राणियों की उपमा जल बुद्‌खुद से दी गई है और कहा गया है, जैसे जल का बु‌बुद जल में विलीन होकर जल के साथ एकाकार हो जाता है, उसी प्रकार प्राणियों का समूह, अमृतसागर स्वरूप परब्रह्म में विलीन हो जाता है, परन्तु ऐसी स्थिति ज्ञान प्राप्ति के बाद ही सम्भव होती है, अधिकांशतया तो प्राणी अज्ञान से ही आवृत होते हैं। दूसरे प्रखण्ड में बताया गया है कि सभी काल, कर्मात्मक और स्वभावात्मक होते हैं। यथार्थ में पाप-पुण्य, अच्छा बुरा कोई नहीं होता, केवल 'मत' (आत्मतत्त्व की निष्ठा) की ही यथार्थता है। इसमें परिनिष्ठित व्यक्ति के लिए मोक्ष-नरक आदि कुछ भी नहीं होता। तीसरे प्रखण्ड में तत्त्वज्ञान को गुहा में प्रविष्ट बताते हुए कहा गया है कि सामान्य जनों की इस मार्ग में प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती। साकार उपासना प्रधान लोग अज्ञान में भटकते रहते हैं। तत्त्वज्ञानी को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा कुत्ते, गधे, बिल्ली में चैतन्यतत्त्व की दृष्टि से कोई अन्तर प्रतीत नहीं होता। अन्तिम चतुर्थ प्रखण्ड में सभी को आत्मतत्त्व सम्पन्न मानकर, सबकी सेवा करने का मर्म समझाया गया है। अन्त में 'गुरु' की महत्ता बताते हुए कहा गया है कि सब कुछ गुरु की कृपा से ही जाना जा सकता है, उनसे बढ़कर कोई भी नहीं यह तथ्य जानने वाला ही जीवन्मुक्त हो पाता है।
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