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सूर्य सिद्धांत Book Cover

सूर्य सिद्धांत

ज्योतिषशास्त्र के विस्तृत वाइमय में मेरु की भाँति विद्यमान सूर्य-सिद्धान्त जहाँ अपनी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता के लिए प्रसिद्ध है वहीं अपनी सरलता (बोधगम्यत्व) के कारण लोकप्रिय भी है। सूर्यसिद्धान्त के उपदेष्टा स्वयं भगवान्‌ सूर्य हैं।
ग्रंथकार: आर्यभट
अध्याय: 14
शास्त्र परिचय
ज्योतिषशास्त्र के विस्तृत वाइमय में मेरु की भाँति विद्यमान सूर्य-सिद्धान्त जहाँ अपनी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता के लिए प्रसिद्ध है वहीं अपनी सरलता ( बोधगम्यत्व ) के कारण लोकप्रिय भी है । सूर्यसिद्धान्त के उपदेष्टा स्वयं भगवान्‌ सूर्य हैं, अत: इस ग्रन्थ का काल निर्धारण विवादास्पद रहा है । सौरसिद्धान्त का उपदेश समय-समय पर क्षियों को होता रहा है जिसमें अन्तिम उपदेश सूर्य के अंशावतार ने 'मय” को दिया था । इस प्रसंग से सूर्यसिद्धान्त की एक विस्तृत परम्परा सिद्ध होती है । सूर्यसिद्धान्त में जो काल भेद का उल्लेख है वह इस सिद्धान्त को प्रामाणिकता एवं जागरूकता को संकेतित करता है । सूर्यसिद्धान्त के ऐतिहासिक पक्ष पर दृष्टि डालने वाले विद्वानों ने वर्तमान सूर्यसिद्धान्त को मयोपदिष्ट सूर्यसिद्धान्त से भिन्न माना है । कुछ विद्वानों ने पज्चसिद्धान्तिका में वर्णित सूर्यसिद्धान्त को मूल सिद्धान्त कहा है । इस सन्दर्भ में श्री बालकृष्ण दीक्षित ने अंपने ग्रन्थ “भारतीय ज्यौतिष”' में लिखा है---वर्तमान सूर्यसिद्धान्त के भगणादिमान और वर्षमान पञ्चसिद्धान्तिकोक्त सूर्यसिद्धान्त के भगणादिमान और वर्षमान से नहीं मिलते । पंचसिद्धान्तिकोक्त सूर्यसिद्धान्त और वर्तमान में प्रचलित सूर्यसिद्धान्त वर्षमान तथा भगणादि मूल तत्त्वों के विषय में एक दूसरे से भिन्न मालम पड़ते हैं । इनमें दूसरा पहले की अपेक्षा नवीन है । क्योंकि वराहमिहिर ने पञ्चसिद्धान्तिका में केवल पहले का ही संग्रह किया है । वर्तमान सूर्यसिद्धान्त पञ्चसिद्धान्तिकोक्त सूर्यसिद्धान्त की अपेक्षा अत्यन्त परिष्कृत तथा सुस्पष्ट है । अत: कुछ विद्वानों का मत है कि यह (वर्तमान ) सूर्यसिद्धान्त आर्षग्रन्थ नहीं है । सूर्यसिद्धान्त में वर्णित 'मय'-सूर्य संवाद से इसका आर्पत्व लक्षित होता है । किन्तु इतिहासकारों ने कुछ श॒कायें व्यक्त की हैं जो इस प्रकार हैं- १. आधुनिक सूर्यसिद्धान्त की रचना “लाटदेव” ने की है। २. आधुनिक सूर्यसिद्धान्त लाटदेव कृत है किन्तु उसके सभी अंश लाटदेव कृत न होकर पः्चसिद्धान्तिकोक्त सूर्यसिद्धान्त से लिये गये होंगे। ३. पञ्चसिद्धान्तिका के कुछ समय बाद किसी ने कई सिद्धान्तों के विशिष्ट अंशों को लेकर नये सिद्धान्त की रचना की हो। रचनाकार का नाम अज्ञात होने से यही ग्रन्थ आर्ष मान लिया गया होगा। उक्त सन्दर्भ में आचार्य ब्रह्मगगुप्त ने लिखा है कि रोमक और वसिष्ठ सिद्धान्तों का ग्रहस्पष्टीकरण आर्यभटीय से मिलता है किन्तु सूर्यसिद्धान्त-रोमक आदि के परिध्यंश आर्यभटीय से न मिलकर मूल सूर्यसिद्धान्त से मिलते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि मूल सूर्यसिद्धान्त को ही किसी आचार्य ने परिष्कृत कर वर्तमान सूर्यसिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया है । वर्तमान सूर्यसिद्धान्त में कुल १४ अधिकार हैं । जिनका नाम क्रमश: इस प्रकार है- १. मध्यमाधिकार, २. स्पष्टाधिकार, ३. त्रिप्रश्नाधिकार, ४. चन्द्रग्रहणाधिकार, ५. सूर्यग्रहणाधिकार, ६. छेद्यकाधिकार, ७. ग्रहयुत्यधिकार, ८. भग्रहयुत्यधिकार, ९. उदयास्ताधिकार, १० . चन्द्रश्नृड्रोन्नत्यधिकार, ११. पाताधिकार, १२. भूगोलाध्यायाधिकार १३. ज्यौतिषोपनिषदाध्याय, १४. मानाध्याय । सभी अधिकारों की श्लोकसंख्या ५०० है। रचना काल - सूर्यसिद्धान्त के रचना काल के सन्दर्भ में मतैक्य नहीं है। सूर्यसिद्धान्त के आधार पर इसकी रचना कृतयुग के अन्त में हुई । इस प्रकार शक्‌ १९२० तक २१६५०९९ वर्ष पूर्व इसकी रचना हुई। यह रचना काल समीक्षकों एवं इतिहासकारों द्वारा समर्थित नहीं हो सका है। इसे प्रमाण न मानने में हेतु दिया गया है कि यदि सूर्यसिद्धान्त इतना प्राचीन होता तो महाभारत में वर्ष गणना को लेकर विवाद नहीं होता तथा वार गणना का भी स्पष्ट उल्लेख होता । परन्तु महाभारत में वार गणना का कहीं भी उल्लेख नहीं है, अत: सूर्यसिद्धान्त परवर्ती ही है। आर्यभट्ट ने भी अपने ग्रन्थों में सूर्यसिद्धान्त का उल्लेख नहीं किया है इससे अनुमान होता है कि आर्यभट्ट के ४७६ ई० के आसन्न ही सूर्यसिद्धान्त का काल रहा होगा। परन्तु कुछ विद्वानों का मत है कि सूर्यस्िद्धान्त मूलरूप में पञ्चसिद्धान्तिका में ही है। कालान्तर में कुछ विद्वानों ने परिष्कार कर इसे वर्तमान सूर्यसिद्धान्त का रूप प्रदान किया है।
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