शुकरहस्य
शुकदेव के माध्यम से यह उपनिषद् सिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य है। जब व्यक्ति अपने भीतर के उस आत्मतत्त्व को जान लेता है, तब भय, मोह और बन्धन समाप्त हो जाते हैं और वही मोक्ष है।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 1