शाट्यायनीय
इस उपनिषद् में मन को बन्धन एवं मोक्ष का कारण बताया गया है, तत्पश्चात् साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, शमादि सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व), कुटीचक का स्वरूप तथा अन्य संन्यासियों के धर्म, योग-यज्ञ आदि के चार रूप, परिव्राजकों के कर्तव्य, उनके निवास विषयक नियम, आत्मज्ञान से युक्त साधक की स्थिति, संन्यास धर्म से च्युत होने पर प्रत्यवाय (पाप) लगने का विशद वर्णन है। अन्त में विष्णुलिंग संन्यासी की फलश्रुति बताई गई है।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 1