षड्जगीता महाभारत के शान्तिपर्व में विद्यमान है। इस गीता का मुख्य प्रतिपाद्य-विषय पुरुषार्थ-चतुष्टय अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की तुलनात्मक विवेचना करके उसमें श्रेष्ठतम का अनुसन्धान करना है। धर्मराज युधिष्ठिर ने पूर्वपक्ष के रूप में अपने चारों भाइयों तथा विदुरजी से उनका मत जानकर फिर उत्तरपक्ष के रूप में अपना मत बताया है।
फलतः इस छोटी-सी गीता में जीवन के सभी पक्षों से सम्बद्ध तौँका विश्लेषण भी है और निष्कर्षस्वरूप मोक्षप्राप्ति का गूढ़ उपाय (ज्ञान) भी बताया गया है। पाँचों पाण्डव और छठे महात्मा विदुर के विचार ग्रथित होने से इसे 'षड्जगीता' कहा गया है। इसी षड्जगीता को यहाँ सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है।
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“जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ”