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रत्नगोत्रविभाग Book Cover

रत्नगोत्रविभाग

रत्नगोत्रविभाग (संस्कृत: रत्नगोत्रविभाग), जिसे सामान्यतः उत्तरतन्त्र शास्त्र के नाम से भी जाना जाता है, महायान बौद्ध दर्शन का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ है जो तथागतगर्भ (बुद्ध-स्वभाव) के सिद्धान्त की व्याख्या करता है—यह शिक्षा कि सभी प्राणियों में बुद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता निहित होती है। इस ग्रंथ की परंपरागत रूप से रचना Maitreya को मानी जाती है और कहा जाता है कि इसे भारतीय आचार्य Asaṅga को प्रदान किया गया था।
ग्रंथकार: मैत्रेय बुद्ध
अध्याय: 5
शास्त्र परिचय
रत्नगोत्रविभाग (संस्कृत: रत्नगोत्रविभाग), जिसे सामान्यतः उत्तरतन्त्र शास्त्र के नाम से भी जाना जाता है, महायान बौद्ध दर्शन का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ है जो तथागतगर्भ (बुद्ध-स्वभाव) के सिद्धान्त की व्याख्या करता है—यह शिक्षा कि सभी प्राणियों में बुद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता निहित होती है। इस ग्रंथ की परंपरागत रूप से रचना Maitreya को मानी जाती है और कहा जाता है कि इसे भारतीय आचार्य Asaṅga को प्रदान किया गया था। यह ग्रंथ मन की अंतर्निहित शुद्धता का व्यवस्थित विश्लेषण करता है और यह समझाता है कि यह बुद्ध-स्वभाव सभी प्राणियों में उपस्थित होने के बावजूद अस्थायी क्लेशों और आवरणों के कारण ढका रहता है। जब साधना और प्रज्ञा के द्वारा ये आवरण दूर हो जाते हैं, तब यह अंतर्निहित जाग्रत स्वभाव पूर्ण रूप से प्रकट होकर बुद्धत्व के रूप में प्रकट होता है। दार्शनिक संरचना इस ग्रंथ की शिक्षाएँ सात “वज्र विषयों” (अडिग या मूल विषयों) के आधार पर व्यवस्थित की गई हैं, जो मार्ग और उसकी सिद्धि की संपूर्ण रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं: बुद्ध – पूर्ण जागृति की अवस्था और उसके परम गुण। धर्म – वह सत्य और अनुभूति जो बुद्ध द्वारा उपदेशित है। संघ – वह आर्य समुदाय जिसने इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। धातु / तथागतगर्भ – वह बुद्ध-तत्व जो सभी प्राणियों में निहित है। बोधि – वह जागरण जो इस अंतर्निहित स्वभाव को प्रकट करता है। गुण – बुद्धत्व के असीम और दिव्य गुण। कर्म (क्रियाशीलता) – प्राणियों के कल्याण के लिए बुद्ध की स्वाभाविक करुणामयी गतिविधि। ये विषय मिलकर महायान दर्शन की संपूर्ण प्रक्रिया का वर्णन करते हैं—साधारण प्राणियों में विद्यमान बुद्ध-स्वभाव से लेकर पूर्ण बुद्धत्व और उसकी करुणामयी गतिविधि के प्रकट होने तक। दार्शनिक महत्व रत्नगोत्रविभाग बुद्ध-स्वभाव सिद्धान्त की सबसे व्यवस्थित और गहन व्याख्याओं में से एक है। यह स्पष्ट करता है कि मन का वास्तविक स्वभाव क्लेशों से शून्य है, फिर भी उसमें प्रकाशमानता, प्रज्ञा और करुणा जैसे अंतर्निहित गुण विद्यमान हैं। इस प्रकार यह ग्रंथ महायान दर्शन की दो प्रमुख धाराओं—शून्यता (शून्यता का सिद्धान्त) और सभी प्राणियों में निहित बुद्धत्व की सकारात्मक प्रस्तुति—के बीच एक सेतु का कार्य करता है। इसी कारण यह ग्रंथ भारत, तिब्बत और पूर्वी एशिया की बौद्ध दार्शनिक परंपराओं के विकास में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ। संस्कृत मूल पाठ का संरक्षण रत्नगोत्रविभाग का मूल संस्कृत पाठ किसी एक पूर्ण प्राचीन पांडुलिपि के रूप में सुरक्षित नहीं रहा। लंबे समय तक यह ग्रंथ मुख्यतः तिब्बती और चीनी अनुवादों तथा इसके पारंपरिक भाष्य Ratnagotravibhāga-vyākhyā के माध्यम से ही ज्ञात था। आधुनिक काल में विद्वानों ने उपलब्ध संस्कृत पांडुलिपि-अंशों और संरक्षित अनुवादों की सहायता से इस ग्रंथ के संस्कृत पाठ का पुनर्निर्माण किया। इसके आधार पर समालोचनात्मक संस्करण तैयार किए गए, जिनका उद्देश्य मूल संस्कृत पाठ को यथासंभव उसके प्राचीन रूप के निकट पुनर्स्थापित करना था। इस ऐप में प्रस्तुत संस्कृत श्लोक इन्हीं उपलब्ध और पुनर्निर्मित संस्कृत स्रोतों पर आधारित हैं, जो भारत में रचित मूल ग्रंथ के सबसे निकट माने जाते हैं। इस प्रकार पाठक इस ग्रंथ को उसकी शास्त्रीय संस्कृत भाषा में पढ़ सकते हैं और इसके मूल दार्शनिक शब्दों तथा काव्यात्मक संरचना का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। परंपरा और प्रभाव बुद्ध-स्वभाव की विस्तृत व्याख्या के कारण रत्नगोत्रविभाग महायान बौद्ध दर्शन के सबसे प्रभावशाली ग्रंथों में से एक बन गया। इसकी शिक्षाएँ आज भी बौद्ध दर्शन, ध्यान-परंपरा और सभी प्राणियों में निहित जागृति की संभावना के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
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