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परमहंसगीता Book Cover

परमहंसगीता

इसमें परमहंस अवस्था में विचरण करते परमज्ञानी ब्राह्मण भरत की सिन्धुनरेश रहूगण से भेंट होने तथा उनके द्वारा राजा को दिये गये गूढ़ तात्त्विक उपदेशों का वर्णन है। इस गीता में दस इन्द्रियाँ तथा अहंकार - ये ग्यारह वृत्तियाँ मन की बतायी गयी हैं, जो माया के वशीभूत होकर सुख-दुःख का अनुभव कराती हैं।
ग्रंथकार: व्यास
अध्याय: 5
शास्त्र परिचय
परमहंसगीता श्रीमद्भागवतमहापुराण के पंचम स्कन्ध के अन्तर्गत रहूगणोपाख्यान के रूप में प्राप्त होती है। इसमें परमहंस अवस्था में विचरण करते परमज्ञानी ब्राह्मण भरत की सिन्धुनरेश रहूगण से भेंट होने तथा उनके द्वारा राजा को दिये गये गूढ़ तात्त्विक उपदेशों का वर्णन है। भरत नामक वे ब्राह्मणश्रेष्ठ सर्वदा अद्वैतभाव में स्थित रहने के कारण बाह्यतः जड़ प्रतीत होते थे, अतः उन्हें जडभरत भी कहा जाता है। इस गीता में दस इन्द्रियाँ तथा अहंकार - ये ग्यारह वृत्तियाँ मन की बतायी गयी हैं, जो माया के वशीभूत होकर सुख-दुःख का अनुभव कराती हैं। जब ज्ञानोदय द्वारा माया का तिरस्कार कर आसक्ति को छोड़ने से आत्मतत्त्व का ज्ञान होता है, तब मनुष्य सुख-दुःख से परे हो जाता है, वह सदा परम आत्मानन्द में डूबा रहता है। इस गीता में विषयवार्ता का त्याग, आत्मानुसन्धान, अनासक्ति तथा गुरु एवं श्रीहरि के चरणों का आश्रय ही माया से बचने के उपाय बताये गये हैं। पुनर्जन्मविषयक संक्षिप्त दृष्टान्त तथा भवाटवी के विस्तृत रूपक के कारण यह गीता रोचक तथा सुबोध भी हो गयी है। पाँच अध्यायों वाली यह परमहंसगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है।
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