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निरालम्ब Book Cover

निरालम्ब

निरालम्बोपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा से संबंधित एक प्रमुख और ज्ञानवर्धक उपनिषद है। यह उपनिषद मुख्य रूप से दार्शनिक शब्दावली के रूप में कार्य करता है, जिसमें अध्यात्म और वेदांत की २९ आधारभूत अवधारणाओं को प्रश्नोत्तर के माध्यम से अत्यंत सरल और स्पष्ट रूप से समझाया गया है।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 1
शास्त्र परिचय
निरालम्बोपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा से संबंधित एक प्रमुख और ज्ञानवर्धक उपनिषद है। 'निरालंब' का अर्थ है - 'बिना किसी सहारे या आधार के' अर्थात वह शुद्ध चेतना जो स्वयं में स्थित है और जिसे किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं है। यह उपनिषद मुख्य रूप से दार्शनिक शब्दावली (Glossary) के रूप में कार्य करता है, जिसमें अध्यात्म और वेदांत की २९ आधारभूत अवधारणाओं को प्रश्नोत्तर के माध्यम से अत्यंत सरल और स्पष्ट रूप से समझाया गया है। प्रमुख अवधारणाएं और उनका अर्थ इस उपनिषद में ब्रह्म, आत्मा, माया, मुक्ति और ईश्वर जैसे गहन विषयों को स्पष्ट किया गया है:- ईश्वर (Ishvara): सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सब प्राणियों का अंतर्यामी ईश्वर है। जीव (Jiva): 'मैं करता हूँ' और 'मैं भोक्ता हूँ' का अहंकार रखने वाला जीव है, जो अज्ञान के वश में है। प्रकृति/माया (Maya): यह कोई अलग शक्ति नहीं, बल्कि परमात्मा की ही शक्ति है जो अज्ञान और भ्रम का आवरण डालती है। जाति (Caste): यह उपनिषद स्पष्ट करता है कि जाति केवल शारीरिक या व्यावहारिक वर्गीकरण (चमड़ी, मांस, हड्डी) है, आत्मा की कोई जाति नहीं होती। मोक्ष/मुक्ति (Moksha): अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को पहचानना और सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाना ही मोक्ष है। उपनिषद की मुख्य शिक्षाएँ अद्वैत का संदेश: यह उपनिषद अद्वैत वेदांत पर जोर देता है, जिसके अनुसार यह संपूर्ण सृष्टि और आत्मा मूल रूप से एक (परब्रह्म) ही है। सत्य की पहचान: यह सिखाता है कि बाहरी दिखावे और भौतिक सुखों को छोड़कर व्यक्ति को अपनी आंतरिक शुद्ध चेतना पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। निरालम्बोपनिषद का सार यह है कि परम सत्य को समझने के लिए किसी बाहरी आश्रय (निरालंब) की जरूरत नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर स्थित ब्रह्म को जानना ही सर्वोच्च ज्ञान है।
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