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मैत्रायण्य Book Cover

मैत्रायण्य

मैत्रायण्युपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध एक महत्वपूर्ण दार्शनिक उपनिषद् है, जिसमें आत्मा, ब्रह्म, मन, प्राण, योग और मोक्ष के गूढ़ सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन किया गया है। संवादात्मक शैली में प्रस्तुत यह ग्रन्थ संसार की अनित्यता और विषयासक्ति से उत्पन्न दुःख का विश्लेषण करते हुए साधक को आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन देता है।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 5
शास्त्र परिचय
मैत्रायण्युपनिषद् (मैत्री उपनिषद्) कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध एक महत्वपूर्ण दार्शनिक उपनिषद् है, जिसमें आत्मा, ब्रह्म, मन, प्राण, योग और मोक्ष के गूढ़ सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन किया गया है। संवादात्मक शैली में प्रस्तुत यह ग्रन्थ संसार की अनित्यता और विषयासक्ति से उत्पन्न दुःख का विश्लेषण करते हुए साधक को आत्मज्ञान की ओर मार्गदर्शन देता है। उपनिषद् का प्रसिद्ध उपदेश है कि मनुष्य के बन्धन और मुक्ति दोनों का कारण मन ही है; अतः मन का संयम और शुद्धीकरण आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य है। इस उपनिषद् में ध्यान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, तर्क और समाधि सहित षडङ्ग योग का वर्णन मिलता है तथा प्राण और मन के पारस्परिक सम्बन्ध को विशेष महत्व दिया गया है। ॐ को ब्रह्म का प्रतीक मानते हुए उसके ध्यान द्वारा परम सत्य के साक्षात्कार का मार्ग बताया गया है। वेदान्त और योग की शिक्षाओं का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करने वाला यह ग्रन्थ साधक को बाह्य जगत् की क्षणभंगुरता से ऊपर उठकर आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता का अनुभव करने के लिए प्रेरित करता है। मैत्रायण्युपनिषद् आत्मचिन्तन, ध्यान और अन्तर्मुखी साधना के माध्यम से शाश्वत शान्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
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