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क्षुरिक Book Cover

क्षुरिक

यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २५ मन्त्र हैं। यह उपनिषद् तत्त्व-ज्ञान के प्रति बन्धक घटकों को काटने में क्षुरिका (छुरी-चाकू) सदृश समर्थ है। योग के अष्टांगों (यम. नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) में से धारणा की सिद्धि और उसके प्रतिफल की यहाँ विशेष रूप से चर्चा है।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 1
शास्त्र परिचय
यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २५ मन्त्र हैं। यह उपनिषद् तत्त्व-ज्ञान के प्रति बन्धक घटकों को काटने में क्षुरिका (छुरी-चाकू) सदृश समर्थ है। योग के अष्टांगों (यम. नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) में से धारणा की सिद्धि और उसके प्रतिफल की यहाँ विशेष रूप से चर्चा है। इस उपनिषद् में कहा गया है कि सर्वप्रथम योग साधना के लिए दृढ़ आसन पर बैठकर प्राणायाम की विशेष क्रियाओं का अभ्यास करते हुए शरीर के सभी मर्म स्थानों में प्राण का संचार उसी प्रकार करे, जिस प्रकार मकड़ी अपने द्वारा निर्मित अति सूक्ष्म तन्तुओं पर गतिशील रहती है। तत्पश्चात् क्रमशः नीचे से ऊपर को ओर बढ़ते हुए हृदय कमल स्थित सुषुम्रा नाड़ी से प्राण तत्त्व का संचार करते हुए तथा अन्य ७२ हजार नाड़ियों का छेदन करते हुए उस परब्रह्म स्थान तक पहुँचा जा सकता है, जहाँ पहुँचने पर जीव (हंस) समस्त बन्धनों को काट डालने में समर्थ हो जाता है। उस समय वह अपने समस्त कर्म बन्धनों को जलाकर परम तत्त्व में उसी प्रकार लय को प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार दीपक निर्वाण (बुझने) के समय तेल बाती सभी को जलाकर परम ज्योति में विलीन हो जाता है। इस प्रकार वह (जीव) पुनः कर्म बन्धन में नहीं बँधता- जीवन मुक्त हो जाता है। यही इस उपनिषद् का सार है।
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