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कौषीतकिब्राह्मण Book Cover

कौषीतकिब्राह्मण

कौषीतकि ब्राह्मण को शांखायन ब्राह्मण भी कहते हैं। इसकी रचना का श्रेय शंखायन अथवा कौषीतकि को जाता है। कौषीतकि शंखायन के गुरु थे। अतः शंखायन ने अपने गुरु के नाम पर इसका नामकरण किया। यह ऋग्वेद की वाष्कल शाखा से सम्बन्धित है। यह 30 अध्यायों में विभक्त है और इसमें 226 खण्ड हैं। इस ग्रन्थ में अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों की भांति मानवीय आचार के नियम और निर्देश दिए गए हैं।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 4
शास्त्र परिचय
यह उपनिषद् ऋग्वेद के कौषीतकि ब्राह्मण का अंश है। इसमें कुल चार अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में गौतम (उद्दालक) एवं चित्र (गर्ग के प्रपौत्र) के संवाद द्वारा अग्निहोत्र एवं उसकी फलश्रुति पर प्रकाश डालते हुए अग्निहोत्री के मरणोपरान्त उसकी जीवात्मा किन-किन लोकों में होती हुई ब्रह्मलोक पहुंचती है, जहाँ अप्सराएँ उसका स्वागत-सत्कार करती हैं, वहाँ एक विचित्र पर्यंक (पलंग) पर ब्रह्माजी विराजमान होते हैं, जिनसे अग्रिहोत्र साधक की वार्ता होती है, अन्त में वह साधक ब्रह्माजी की विशेष विभूति से युक्त होकर उन्हों के सदृश हो जाता है, इत्यादि वर्णन है। इसी को पर्यक विद्या भी कहा जाता है। द्वितीय अध्याय में प्राणोपासना, आध्यात्मिक अग्रिहोत्र, विविध उपासनाएँ, दैवपरिमर में प्राणोपासना, मोक्ष हेतु सर्वश्रेष्ठ प्राणोपासना तथा प्राणोपासक का सम्प्रदान कर्म वर्णित है। तृतीय अध्याय में इन्द्र-प्रतर्दन संवाद के माध्यम से प्रज्ञा स्वरूप प्राण की महिमा का वर्णन है। चतुर्थ अध्याय में अजातशत्रु और गार्ग्य संवाद द्वारा सर्वप्रथम सूर्य, चन्द्र, विद्युत्, मेघ, आकाश, वायु, अग्नि, जल, दर्पण, प्रतिध्वनि इत्यादि में विद्यमान चैतन्य तत्त्व की उपासना की बात कही गई है और अन्त में 'आत्मतत्त्व' के स्वरूप और उसकी उपासना की फलश्रुति का प्रतिपादन किया गया है।
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