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कठरुद्र Book Cover

कठरुद्र

यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें देवताओं द्वारा ब्रह्मविद्या की जिज्ञासा किए जाने पर भगवान् प्रजापति ने संन्यास आश्रम में प्रवेश की विधि सहित आत्म तत्त्व का विवेचन किया है। पंचआत्मा-पंचकोशों का मर्म समझाते हुए परमात्म तत्त्व को ही ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय एवं फल आदि के रूप में स्थापित किया गया है।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 1
शास्त्र परिचय
यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसे 'कण्ठरुद्रोपनिषद्' भी कहा जाता है। इसमें देवताओं द्वारा ब्रह्मविद्या की जिज्ञासा किए जाने पर भगवान् प्रजापति ने संन्यास आश्रम में प्रवेश की विधि सहित आत्म तत्त्व का विवेचन किया है। प्रथम तीन कण्डिकाओं में संन्यास ग्रहण करने की विधि है। ४ से ११ तक संन्यासोपरांत निर्वाह किए जाने वाले विविध अनुशासनों का वर्णन है। उसके बाद ब्रह्म एवं माया का वर्णन करते हुए तन्मात्राओं एवं ब्रह्माण्ड रचना का उालेख है। पंचआत्मा-पंचकोशों का मर्म समझाते हुए परमात्म तत्त्व को ही ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय एवं फल आदि के रूप में स्थापित किया गया है। अंत में इस सारे कथोपकथन को वेदान्त का सार कहा गया है।
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