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जपजी साहिब Book Cover

जपजी साहिब

गुरु ग्रन्थ साहिब की मूलवाणी जपुजी गुरु नानक द्वारा जनकल्याण हेतु उच्चारित की गई अमृतमयी वाणी है। 'जपुजी' एक विशुद्ध , सूत्रमयी दार्शनिक वाणी है जिसमें महत्वपूर्ण दार्शनिक सत्यों को सुन्दर, अर्थपूर्ण और संक्षिप्त भाषा में काव्यात्मक ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। इस वाणी में धर्म के सच्चे शाश्वत मूल्यों को बड़े मनोहारी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें ब्रह्मज्ञान का अलौकिक प्रकाश है।
ग्रंथकार: नानक
अध्याय: 1
शास्त्र परिचय
जपुजी साहिब एक सिख प्रार्थना है जो गुरु ग्रन्थ साहिब के आरम्भ में है। इसकी रचना गुरु नानक देव ने की थी। जपुजी का आरम्भ 'मूलमंत्र' से होता है, उसके बाद इसमें ३८ और पद हैं, और अन्त में 'शलोक' (श्लोक) है। जो ३८ पद हैं वे अलग-अलग छन्दों में है। गुरु ग्रन्थ साहिब की मूलवाणी जपुजी गुरु नानक द्वारा जनकल्याण हेतु उच्चारित की गई अमृतमयी वाणी है। 'जपुजी' एक विशुद्ध , सूत्रमयी दार्शनिक वाणी है जिसमें महत्वपूर्ण दार्शनिक सत्यों को सुन्दर, अर्थपूर्ण और संक्षिप्त भाषा में काव्यात्मक ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। इस वाणी में धर्म के सच्चे शाश्वत मूल्यों को बड़े मनोहारी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें ब्रह्मज्ञान का अलौकिक प्रकाश है। उत्पत्ति गुरु नानक की जन्म साखियों में इस बात का उल्लेख है कि जब गुरुजी सुलतानपुर में रहते थे, तो वे रोजाना निकटवर्ती वैई नदी में स्नान करने के लिए जाया करते थे। जब वे 27 वर्ष के थे, तब एक दिन प्रातःकाल वे नदी में स्नान करने के लिए गए और तीन दिन तक नदी में समाधिस्थ रहे। वृतांत में कहा है कि इस समय गुरुजी को ईश्वर का साक्षात्कार हुआ था। उन पर ईश्वर की कृपा हुई थी और दिव्य अनुकम्पा के प्रतीक रूप में ईश्वर ने गुरुजी को एक अमृत का प्याला प्रदान किया थ। वृतांतों में इस बात की साक्षी मौजूद है कि इस अलौकिक अनुभव की प्रेरणा से गुरुजी ने मूलमंत्र का उच्चारण किया था, जिससे जपुजी साहिब का आरम्भ होता है। संरचना जपुजी का प्रारंभिक शब्द एक ओमकारी बीज मंत्र या 'मूल मंत्र' है जिसमें प्रभु के गुण नाम कथन किए गए हैं। एक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ, निरबैर, अकाल मूरति, अजूनी, सैभं गुर प्रसादि समस्त जपुजी को मोटे तौर पर चार भागों में विभक्त किया गया है- 1. पहले सात पद, 2. अगले बीस पद, 3. इसके बाद के चार पद, 4. शेष सात पद। पहले सात पदों में अध्यात्म की खोजी जीवात्मा की समस्या को समझाया गया है। दूसरा भाग पाठकों को उत्तरोत्तर साधन पथ की ओर अग्रसर करता जाता है, जब तक कि जीवात्मा को महान सत्य का साक्षात्कार नहीं हो जाता। तीसरे भाग में ऐसे व्यक्ति के मानसिक रुझानों और दृष्टि का वर्णन किया है, जिसने अध्यात्म का स्वाद चख लिया हो। अंतिम भाग में समस्त साधना का सार प्रस्तुत किया गया है, जो स्वयं में अत्यधिक मूल्यवान है, क्योंकि इस भाग में सत्य और शाश्वत सत्य, साधना पथ की ओर, उन्मुख मननशील आत्मा का आध्यात्मिक विकास के चरणों का प्रत्यक्ष वर्णन किया गया है।
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