हंसगीता
इसमें भगवान् के हंसावतार द्वारा ब्रह्माजी के मानस पुत्रों-सनकादिक ऋषियों की योग की पराकाष्ठा अर्थात् परमार्थतत्त्व-सम्बन्धी जिज्ञासा का समाधान किया गया है। चित्त को विषयों से कैसे पृथक करे इसका गूढ़ तात्विक उपाय इसमें बताया गया है।
ग्रंथकार: व्यास
अध्याय: 1