श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध में भिक्षु गीता प्राप्त है। इसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने परमसखा उद्धवजी को एक भिक्षु के प्राचीन आख्यान के माध्यम से मनोजय के उपाय समझाये हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कन्ध में भिक्षु गीता प्राप्त है। इसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने परमसखा उद्धवजी को एक भिक्षु के प्राचीन आख्यान के माध्यम से मनोजय के उपाय समझाये हैं। यदि दुर्जन लोग मन को क्षुब्ध करने वाले आचरण भी करें तो भी मुमुक्षु मनुष्य को उद्वेलित न होकर उन्हें पूर्ण क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि सुख अथवा दुःख का कारण कोई और नहीं अपितु मन ही है। यही मोहासक्त मन जीव को कर्मबन्धन में डालता है। इस मन का किसी भी प्रकार एकाग्र होकर भगवान्में लग जाना ही परम योग है। मार्मिक ज्ञानोपदेश वाली यह साधकोपयोगी भिक्षुगीता यहाँ सानुवाद प्रस्तुत की जा रही है।
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