आजगरगीता में एक विरक्त अवधूत द्वारा राजा प्रह्लाद को दिये गये उपदेशों का वर्णन है। यह प्रकरण महाभारत के शान्तिपर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को दिये गये उपदेशों के मध्य आया है।
आजगरगीता में एक विरक्त अवधूत द्वारा राजा प्रह्लाद को दिये गये उपदेशों का वर्णन है। यह प्रकरण महाभारत के शान्तिपर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को दिये गये उपदेशों के मध्य आया है। यह गीता न केवल विरक्त संन्यासियों के लिये उपयोगी है, अपितु उन वृद्धजनों के लिये भी विशेष उपयोगी है, जो प्रायः अपने सभी पारिवारिक दायित्वों को पूर्ण कर चुके हैं तथा शेष जीवन सुख-शान्ति से बिताना चाहते हैं। सुविधाओं तथा अभावों में सम रहने की प्रेरणा देने वाली यह गीता सानुवाद यहाँ प्रस्तुत की जा रही है।
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“जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ”