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अद्वयतारक Book Cover

अद्वयतारक

अद्वैतकारक का अर्थ है “गैर-पहचान, पहचान, एकता, दो नहीं, एक दूसरे के बिना” और तारक - जिसका अर्थ है “मुक्त करना, ढोना, उद्धार करना, बचाने वाला”। ‘तारक’ का शाब्दिक अर्थ है तारा और “आँख की पुतली”। राजयोग में यह है कि भौंहों के बीच और सामने प्रकाश है जो ध्यान के दौरान है।
ग्रंथकार: ज्ञात नहीं
अध्याय: 1
शास्त्र परिचय
अद्वयतारकोपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचयिता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेदव्यास जी को कई उपनिषदों का लेखक माना जाता है। अद्वैतकारक एक समग्र संस्कृत शब्द है, जिसमें आद्य (अद्वैत) शामिल है, जिसका अर्थ है “गैर-पहचान, पहचान, एकता, दो नहीं, एक दूसरे के बिना” और तारक (तारक)। जिसका अर्थ है “मुक्त करना, ढोना, उद्धार करना, बचाने वाला”। ‘तारक’ का शाब्दिक अर्थ है तारा और “आँख की पुतली”। राजयोग में यह है कि भौंहों के बीच और सामने प्रकाश है जो ध्यान के दौरान है।
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